प्राकृतिक चिकित्सा

प्राकृतिक चिकित्सा

स्वस्थ जीवन ब्लॉग को शुरू करते हुए मैं कांति भट्ट जी के प्राकृतिक चिकित्सा संबंधी एक लेख से बात को आगे बढ़ता हूँ। इससे मेरे इस ब्लॉग को शुरू करने का उद्देश्य पता चलेगा।


श्री कांति भट्ट जी के शब्दों में प्राकृतिक चिकित्सा

आज से 76 साल की उम्र में भी मैं 15 घंटे काम कर सकता हूं। इसकी वजह यह है कि मैं गांधीजी के निसर्गोपचार के सिद्धांत में यकीन करता हूं ,इसीलिए मोहनदास करमचंद गांधी उर्फ गांधीजी के बारे में आलेख लिखने का मैं हकदार और अधिकारी तथा इसका बहुत आभारी भी हूं ।1952 में बी .कॉम. करने के बाद अहमदाबाद के साबरमती आश्रम में चार्ल्स कोरिया ने गांधी म्यूजियम बनाया और 1953 में मेरी नियुक्ति वहां सहायक संग्रहाध्यक्ष के तौर पर हुई ।उन्होंने पहली शर्त रखी वहां खादी पहन कर ही आना होगा, लेकिन यह शर्त मेरे लिए जरूरी नहीं थी क्योंकि मैं खादी के कपड़े ही बनता था। मैं 1954 में उरलीकांचन स्थित गांधीजी के निसर्गोपचार आश्रम में पहले मरीज बनकर गया और बाद में वही सेवक बनकर रह गया।


निसर्गोपचार बहुत ही पुराना शास्त्र है । हिपोक्रेट्स को एलोपैथी के पितामह के रूप में जाना जाता है ।उन्होंने ही 2000 साल पहले प्रकृति के तत्वों की मदद से दुरुस्त होने के विचार को बढ़ावा दिया था । भारत में इस ख्याल को सुदृढ़ करने वाले पुणे के डॉ दिनशा मेहता थे ।1944 में दिनशा मेहता आगा खां पैलेस में ब्रिटिश सरकार के कैदी थे उस वक्त गांधी जी को मलेरिया हो गया था तो उन्होंने निसर्गोपचार के जरिए गांधीजी का मलेरिया ठीक कर दिया था । तब से गांधीजी उनके भक्त बन गए थे । गांधीजी की हत्या के 3 वर्ष पहले 18 -11- 1945 के दिन मेहता की प्रेरणा से भारत में पहली बार ऑल इंडिया नेचर क्योर फाउंडेशन ट्रस्ट की नींव रखी गई थी ।आज 61 साल बाद भी गुजरात में 35 से भी ज्यादा ,नाशिक- देवलाली, हैदराबाद, दिल्ली और पूरे भारत में निसर्गोपचार केंद्र है।

गांधीजी का निसर्गोपचार 21 सदी में विशेष तौर पर प्रासंगिक है। मेरी खाना बनाने वाली बाई निसर्गोपचार के बारे में कुछ नहीं जानती ।उसके डायबिटीज और दवाइयों का खर्च महीने में ₹800 का है । आज डायबिटीज झुग्गियों में भी अपने पैर पसार लिए हैं ।दुनियाभर में दवाई कंपनियां 350 अरब डॉलर की एलोपैथिक दवाइयां बेच रही है । कहावत है कि मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की। दवाई के खर्च या साइड इफेक्ट से ही मरीज मरता है। दवा के साइड इफेक्ट से बचने के लिए निसर्गोपचार ही सही इलाज है।

मैं जब इंटर कामर्स में था तब बड़ोदरा के हॉस्टल में अवस्थित खानपान और परीक्षा की चिंता से मुझे पेचिश की बीमारी हो गई और बाद में बड़ी आंत में घाव हो गया जिसकी वजह से बड़ी आंत सिकुड़ गई ।उस वक्त भावनगर से तख्तसिंहजी अस्पताल के सर्जन डॉ दस्तूर ने आखिरी निदान दिया कि मेरा केस निराशाजनक है ।मैं बी.काम हो गया था । पेचिश का दर्द बढ़ गया तब भावनगर के सणोसरा में विनोबा भावे के सानिध्य में सर्वोदय सम्मेलन और प्रदर्शनी का आयोजन हुआ था । इसमें बचूभाई चोटाई नामक एक गांधी भक्त ने निसर्गोपचार के बारे में एक स्टाल लगाया था ।जब बचू भाई को निमोनिया हुआ था तो गांधीजी ने डॉक्टर बनकर मिट्टी के लेप ,फलाहार और उपवास के जरिए उन्हें ठीक किया था ।

गांधी जी ने कई साल पहले की अडोल्फ जुस्ट की किताब “रिटर्न टू नेचर ‘ पढ़ी थी। उसे पढ़कर वे प्राकृतिक उपचार के उपासक बन गए। हमारा शरीर पंच महाभूत यानी पृथ्वी (मिट्टी के लेप),वायु (हवा स्नान),आकाश (उपवास) और अग्नि का बना हुआ है ।
अग्नि यानी खानपान में संयम रखते हुए पेट पर ज्यादा बोझ न डालते हुए पाचक रस को बनाये रखना,वैसे ही सूर्य स्नान करके बीमारी को दूर भगाना। मेरा पुराना पेचिश का दर्द उपवास, कटिस्नान(जलोपचार)और विशेष तौर पर पेट पर मिट्टी के लेप और सब्जियों के रस, छाछ पिला कर दो महीने में ठीक किया ।

आज मैं निसर्गोपचार पर ही जीवित हूं गांधीजी और विनोबा भावे ने उरलीकांचन के निसर्गोपचार केंद्र में एक बोर्ड रखवाया था जिसमें कुछ इस तरह लिखा था कि “यहां से रोगी को योगी बनके जाना है ” । आज 21वी सदी में इंसान जीने के लिए नहीं खाता , लेकिन तले हुए पकवान, मजेदार व्यंजन ,पटाखेदार जंक फूड ,कोका कोला पीने के लिए जीता है । मैं निसर्गोपचार आश्रम में रहने के बाद आज 52 साल से खानपान के लिए योगी हूं । तला हुआ और जंग फूड नहीं खाता । सुबह नाश्ते के बजाय मौसमी या सेब का जूस पीता हूं । दोपहर के खाने में चावल के आटे से बनी दो रोटी ,अंकुरित किए हुए मूंग का सूप ,चावल और लौकी की सब्जी इतना ही सुबह शाम 365 दिन खाता हूं ।
10:00 बजे सो जाता हूं मेरा मेडिकल बिल जीरो है थैंक्स टू गांधीजी ।

गांधी जी को मैं जिस क्षेत्र में ज्ञान और जीवनशैली के लिए चाहता हूं उसके बारे में विस्तृत रूप से बात करने की मेरी तमन्ना को मैं रोक नहीं पाता। सर्वोदय नेता बिनोवा भावे को भी मेरी तरह हिमालय जाने का मन हो गया था। रास्ते में बनारस उतर गए और उन्होंने वहां गांधी जी के प्रवचन सुना तो हिमालय जाने की इच्छा को वहीं रोक दिया। उस वक्त आश्रम जीवन के विचार को उन्होंने अमदाबाद के कोचरब आश्रम में साकार किया था ।आश्रम में गांधी जी अपने हाथों से 50 सेवकों के लिए सब्जी कांटा करते थे ।

बिनोवा भावे का परिचय गांधीजी से 91 साल पहले कोचरब के आश्रम में हुआ था। गांधीजी हाथ की चक्की से गेहूं पीसते थे । लगातार पन्द्रह मिनट तक एक ही हाथ से गेहूं पीसते थे । मैंने भी उरलीकांचन आश्रम में हाथ की चक्की चलाई है।आश्रम में हाथ से पीसे गेहूं की रोटी खाने को मिलती है ।कोचरब में एक इमाम साहब की बेटी थी,जिनकी मदद से गांधीजी रसोई का काम संभालते थे। इसके बाद गांधीजी साबरमती आश्रम में रहने आ गए। साबरमती आश्रम जो आज सिर्फ एक प्रदर्शन के तौर पर ही रह गया है ,वहां कभी गांधी जी और उनके सेवक हाथों से बर्तन माँजा करते थे ।

बिनोवा भावे के भाई बालकोबा भावे जिन्होंने गांधी जी की मृत्यु के बाद उनके निसर्गोपचार आश्रम को संभाला उनसे एक बात की जानकारी मिली कि गांधी जी के आश्रम में जर्मन, ब्रिटिशर और यूरोपियन आते थे ।गांधीजी ने जर्मन से आई केलेनबेक को मालिश करना सिखाया था। सरदार वल्लभ भाई पटेल को कोलाइटिस हो गया तब गांधी जी ने वर्धा के निकट सेवाग्राम आश्रम में लेकर आए थे ।उन्हें प्राकृतिक उपचार से ठीक करने वाली केलेनबेक जर्मन महिला मित्र जब सेवाग्राम में आई तो वह माँसाहार छोड़ न सकी तबगांधी जी प्रेक्टिकल बन कर वर्धा से माँस मंगवा कर खिलाते थे । धीरे-धीरे उसे मांसाहारी से शाकाहारी बनाया ।

गांधी जी ने राजकुमारी अमृत कौर का भी उपचार किया था। मेहता ने स्वराज के पहले कई राजनेताओं को कुदरती उपचार से ठीक कर दिया था अगर उनके नामों की जानकारी देखेंगे तो आश्चर्यचकित हो जाएंगे ।

सर और लेडी स्टेफर्ड क्रिप्स को पुराना जुकाम था, जयप्रकाश नारायण की किडनी कमजोर थी, मोहम्मद अली जिन्ना को पुराना जुकाम और दमे की बीमारी थी, गुलजारी लाल नंदा को दमे की बीमारी थी ,प्रिंस आगा खाँ की माता जी को भी दमे की बीमारी थी इन सभी ने निसर्गोपचार में डॉ दिनशा मेहता से इलाज कराया था ।

गांधीजी ने सेवाग्राम ( वर्धा )आश्रम में अहिंसक शहद के लिए मधुमक्खी का छत्ता रखा था ।उरलीकांचन आश्रम में और दूसरे निसर्गोपचार आश्रम में मरीज को सुबह अदरक वाला पानी ,नींबू और शहद सबसे पहले दिया जाता है ।गांधी जी वर्धा में अहिंसक शहद का उपयोग किया करते थे। सरदार पटेल की पुरानी पेचिश की बीमारी सेवाग्राम में ठीक ना होने पर 1945 में उन्हें पुणे के दिनशा मेहता के निसर्गोपचार केंद्र में भेजा ।

गांधी जी ने दिनशा मेहता से पूछा,” कहो आपके लिए मैं क्या कर सकता हूं ? तो दिनशा मेहता ने कहा , एक नेचर क्योर यूनिवर्सिटी स्थापित करें। यह सुनकर बल्लभ भाई पटेल कहने लगे ,”अभी स्वराज के ठिकाने नहीं और निसर्गोपचार का सिर दर्द क्यों ले रहे हैं।’

गांधीजी ने ऐसी कोई यूनिवर्सिटी का निर्माण तो नहीं किया ,लेकिन उरलीकांचन में निसर्गोपचार आश्रम की स्थापना जरूर की। शुरुआत में वहां 12-13 मरीज आते थे। आज वहां 100 से ज्यादा मरीज आते हैं।

पुणे से 18 मील दूर और बस के रास्ते में उरुली गांव है। ट्रेन में दौड़ – मनमाड एक्सप्रेस से उरलीकांचन स्टेशन पर उतर सकते हैं । ग्वालियर के महाराजा ने इस आश्रम के लिए ₹5000 दान में दिए थे । मणिभाई देसाई इस आश्रम के व्यवस्थापक बने । आश्रम के लिए गिर की गाये भी लाई गई ।आश्रम की एक गाय ने 50 सेर दूध एक दिन में दिया, इसके लिए आश्रम की गौशाला को राष्ट्रपति अवार्ड दिया गया । डॉ दिनशा मेहता पहले पारसी थे जिन्होंने निसर्गोपचार की नींव रखी थी और डॉ एम. एम. भमगरा दूसरे पारसी निसर्गोपचारक है। कच्छ में दो निसर्गोपचार केंद्र हैं । भारत में जिन्होंने भी निसर्गोपचार का सहारा लिया है ,वह गांधीजी के ऋणी हैं।

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